Sunday, March 23, 2025

फिर भी अवैध संबंध?

फिर भी अवैध संबंध?

रात के 2:30 बजे दुर्ग रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 2-3 पर यात्रियों की भारी भीड़ जमा थी। सभी यात्री बेसब्री से ट्रेन के आने का इंतजार कर रहे थे।

बारिश का मौसम था, बादल गरज रहे थे, लेकिन बारिश नहीं हो रही थी। ठंडी-ठंडी हवाएं चल रही थीं, जिससे मौसम और ज्यादा ठंडा हो गया था। लोग सर्दी से कांप रहे थे।

इसी दौरान, कविता और नीरज ठंड से सिहरते हुए अपने हाथों में सूटकेस और अन्य सामान लिए स्टेशन के ब्रिज से नीचे उतर रहे थे। वे आपस में बातें करते हुए प्लेटफार्म की ओर बढ़ रहे थे।

कविता ने साड़ी के पल्लू से अपना मुंह ढक रखा था, जबकि नीरज ने रूमाल से।

कविता फुसफुसाते हुए नीरज से कहती है "नीरज ! लोगों की तरफ ज्यादा मत देखो, तुम्हारी पर्सनालिटी को देख कर भी पहचान सकते है, इसलिए सर नीचे करके चलते रहो"

नीरज सिर हिलाते हुए कहता है "हूं , मुझे मालूम है"

प्लेटफार्म नंबर 3 में 'पूरी से गांधीधाम (गुजरात)' की ओर जाने वाली सूपर फास्ट ट्रेन आधे घंटे में आने वाली थी ।

दोनों आगे बढ़ते हुए, जनरल बोगी रूकने वाली स्थान पर पहुंच जाते हैं और सामान नीचे रख कर इंतजार करने लगते हैं ।

यहां, बोगी में चढ़ने वाले यात्रियों की काफी भीड़ थी । कुछ यात्री तो बिल्कुल प्लेटफार्म के बॉर्डर पर खड़े थे ।

कविता कहती है : नीरज, इतने भीड़ में हम बोगी में चढ़ पाएंगे?"

नीरज : "भीड़ तो है, पर किसी भी तरह हमें चढ़ना होगा, और कोई रास्ता नहीं है"

कविता सुनकर चुप हो जाती है और थोड़ी देर बाद उदास मन से कहती है "नीरज ! आखिर मैने तुम्हें पाने के लिए अपना घर द्वार और बच्चो को छोड़ कर आ ही गई .... बस रूक रूक कर राहुल की याद आ रही है"

नीरज कहता है "हां, आएगी छोटा है ना .... देखो कविता ! अभी भी मौका है, सोच लो, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है .... घर में सब सो रहे होंगे, ऑटो में बैठा दूंगा, वापस जाकर, कोई भी बहाना बना देना"

कविता ने थोड़ा रुक कर रूंधे गले से जवाब दिया...... "नहीं नीरज, वापस जाने वाली कोई बात नहीं है, मैंने सब सोच कर ही तुम्हारे साथ जाने का फैसला किया है ...... अब मेरी जिंदगी के साथ जो भी होगा वह मुझे मंजूर है"

"मेरे घर वाले जो भी सोचें, सोचने दे, समाज जो भी कहें, कहने दें........ बच्चों को अभी भूल नहीं पा रही हूं , पर ........ धीरे धीरे उन्हें भूलने की कोशिश करुंगी"

कविता ने आगे कहा ..... " मैंने तुम्हारे प्यार के भरोसे इतना बड़ा निर्णय लिया है ....... बच्चे बड़े होकर मेरे बारे में क्या सोचेंगे ..... इसकी मुझे अब कोई परवाह नहीं है"

"कल को समाज यही कहेगा ना कि एक मां अपने स्वार्थ के लिए अपने तीन बच्चों को छोड़ कर एक पराए मर्द के साथ भाग गई .... बोलने दो वो भी मुझे मंजूर है"

"बस तुम मेरा साथ देते रहना .... मैं आगे की जिंदगी को आराम से गुजार लुंगी ...... और हर तकलीफ को सह लुंगी ।

"जब मेरे लिए तुमने अपने घर माता पिता और पत्नी और बच्चों को छोड़ दिया है ..... तो मैंने तो केवल बच्चों को ही छोड़ा है । अशोक तो मुझसे अब नफरत करेगा"

(इसी समय एक अजनबी इन दोनों के करीब आता है, दोनों कुछ क्षण के लिए झेंप जाते हैं)

यात्री, नीरज की ओर देख कर पूछता है.....भाई साहब 'अहमदाबाद' जाने वाली ट्रेन इसी प्लेटफार्म में आएगी ना ?"

"हां, इसी में आएगी" .... नीरज जवाब देता है (अजनबी आगे बढ़ जाता है)

नीरज, कविता की आंखों में झांकते हुए कहता है - "कविता तुम्हें मालूम है कि मैं तुमसे कितना प्यार करता हूं ........ क्या अभी भी मेरे प्यार पर कोई शक़ है? मैंने भी अपने प्यारे दो बच्चों को पीछे छोड़ा है"

कविता ......."नहीं, नहीं नीरज ऐसी कोई बात नहीं है, तुम पर शक़ की कोई गुंजाइश नही है ...... यदि शक़ या संदेह होता तो ...... मैं तुम्हारे साथ जिंदगी बिताने का फैसला नहीं करती ....... इतना बड़ा निर्णय नही लेती"

तभी दूर से ट्रेन आने की आवाज आती है । नीरज और कविता एक दूसरे की तरफ देखते हैं, जैसे कह रहे हो, चलो अब चलना है .... दोनों की आंखों में सहमति का भाव दिखाई देता है ..... दोनो अपना अपना सामान उठा कर तैयार हो जाते हैं ।

ट्रेन, प्लेटफार्म में धीमी गति से गुजरते हुए रुकने लगती है। जनरल बोगी ठीक उनके सामने आ कर रुकती है, जो यात्री प्लेटफार्म के जस्ट किनारे खड़े थे, वे पहले बोगी में एक दूसरे को धकेलते हुए घुस जाते हैं ।

कुछ लोग दूसरी तरफ की गेट तरफ भागते हैं, भीड़ जरा सा छंटने के बाद, जैसे तैसे दोनों ट्रेन में चढ़ जाते हैं ।

भीड़ काफी थी, सीट पूरी भरी हुई थी, लोग बीच में भी खड़े होकर यात्रा कर रहे थे, ट्रेन के भीतर खड़े होने के अलावा और कोई option नहीं था, अंदर की ओर जाना बेकार था, वे दरवाजे और बाथरूम के बीच खड़े रहना सही समझा ... 5 मिनट बाद ट्रेन चलने लगती है ।

कविता शांत खड़ी रहती है, नीरज इशारा करते हुए कहता है "क्या हुआ?"

कविता कहती है "बस यूं ही, अपनी जिंदगी के बारे में सोच रही थी... (थोड़ा रुक कर) नीरज! जानते हो, जब मेरी शादी अशोक से हुई थी, तब मेरी उम्र मात्र 17 साल थी। अशोक को तो तुम जानते ही हो—सीधा-सादा और सच्चा आदमी। जब वह मुझे देखने आया था, तो पहली ही नजर में पसंद कर लिया था। वह मुझे खूब प्यार करता था... और आज, मैं उसे छोड़ रही हूं।

नीरज हंसते हुए कहता है : "छोड़ रही हूं क्या? छोड़ दिया"

कविता भी हंसती है : "हां, छोड़ दिया"

कविता और नीरज का परिवार छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में रामनगर गांव में रहता था । कविता का पति अशोक एक पब्लिक सेक्टर कंपनी के कैंटीन में कुक का काम करता था , सेलरी अच्छी थी, खुशहाल जिंदगी थी ।

तभी, एक चाय वाला "चाय चाय" करता हुआ बोगी मे आता है । नीरज, कविता को चाय पीने का इशारा करता है, सुबह के साढ़े चार बजने वाले थे । कविता "हां" में सिर हिलाती है, नीरज दो चाय ले लेता है, दोनो पीने लगते हैं ।

कविता की शादी को 14 साल बीत चुके थे। इस दौरान उसके तीन बच्चे हुए—पहला बेटा शेखर (जो अब 13 साल का है), दूसरी बेटी पायल (अब 9 साल की) और तीसरा बेटा राहुल (अब ढाई साल का)।

ट्रेन में सफर के दौरान कविता के मन में विचार उमड़ रहे थे—"मेरे जाने के बाद अशोक और बच्चे क्या कर रहे होंगे?"

आज, वह अपने स्वार्थ के लिए अपना घर-द्वार और तीनों बच्चों को छोड़कर हमेशा के लिए नीरज के साथ एक नई जिंदगी के सपने संजोए यात्रा कर रही थी।

और उधर, घर में...

क्या आप कल्पना कर सकते हैं? एक पत्नी और बच्चों की माँ, जो रात के अंधेरे में किसी दूसरे मर्द के साथ भाग जाए—उसके पति और बच्चों पर क्या बीत रही होगी?